Tuesday, 10 October 2017

जाने दो

 *जाने दो*
वो जाते हैं तो चले जाने दो
कभी किसी को पछताने दो
मुड़ कर देखो मत कुछ
उनको भी आगे बढ़ जाने दो
कितना भी मुश्किल आए
लबों को मुस्कुराहट लाने दो
पढ़ लो अनगिनत कहानियां
दूसरों को खामोश हो जाने दो
ढूंढ लो एक रिश्ता और किसी में
किसी रिश्ते को बिछड़ जाने दो।
रास्ते हर बार नई आने दो
कदम अपने रुक न जाने दो
हार हो तो स्वीकार कर लो
किसी की जीत तो हो जाने दो
आंसुओं को कभी रोको नहीं
इन्हें वक्त पर निकल जाने दो।
लम्हा-लम्हा यूँ ही जीते चले जाओ
जो जुड़ते है उन्हें जोड़ते जाओ
कभी अंत होगा जो याद बनेगी
गुजरे पल कोई तो गुजर जाने दो
किसी को इतिहास बन जाने दो
वर्तमान को अतीत बन जाने दो
-प्रभात



लिखने लगा हूँ मैं

लिखने लगा हूँ मैं ..जो सहने लगा हूँ मैं
आदत सी हो गयी... अब जो कहने लगा हूँ मैं
कसमें है वादें है झूठे... खाने लगा हूँ मैं
होश में भी आके मैं... सब बताने लगा हूँ मैं
फ़िक्र नहीं है खुद की भी...तो गाने लगा हूँ मैं
बड़े बदनसीब बनकर आये है हम-2
जीने के लिए सारी... जिन्दगी भी है कम
चलते चलते सपनों में ....खोने लगा हूँ मैं
दुनिया वालों मेरी सुध भी ले लो-2
हंसने -गाने के सुख भी दे लो
जाने कहा से अब.....डरने लगा हूँ मैं
सहने लगा हूँ .....बस कहने लगा हूँ मैं



कह नहीं सकता

कुछ कहना था आज तुमसे, लेकिन आज कह नहीं सकता।
हां थोड़ा बहुत मज़ाक और कुछ अपना ज्ञान बांट नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकता।
कुछ बचे हुए सवाल नहीं कर सकता और अब जवाब
ढूंढ नहीं सकता।
जो वादे थे वो चाहकर पूरा कर नहीं सकता।
हां कुछ उलझनें तुम्हारी सुन सकता हूं मगर उन्हें मिटा नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ बाँट नहीं सकता।

#मजबूरियाँ# जीवन की सच्चाई#



तुम थे जमाना था

तुम थे जमाना था, जमाने में सब कुछ था
यकीं मानो कुछ नहीं, तो आईना भी खुश था
अब तो सिरदर्दियाँ इतनी है, धूप में भी बादल है
बादल की गरज और बिन मौसम बरसात है
जब भी तुम्हें सोचू, लगता है वहीं सब कुछ था
तुम थे.....

अक्सर जब तुम्हारी जुल्फें दिखती हैं
काली आंखों से तुम्हारी नजरें मिलती हैं
हल्की सी मुस्कुरा देती हो बेसुध हो जाता हूँ
ये सब कहीं और नहीं आईनें में होता है
आँखें अब भीग जाती हैं, पहले गम न था
तुम थे......
हर तरफ तुम्हारे इशारे पर लेता हूँ करवटें
तुम्हारे जाने पर भी तुम्हारा नाम है लबों पर
जितना मैं सोचता हूँ, बता दूं तो सच न लगेगा
दुनियां पागल समझती है, तुम्हें भी लगेगा
सुखाने को आंसू, तुम्हारा चेहरा काफी था
तुम थे......
प्रभात
#सचनामा
तस्वीर गूगल साभार
 23/09/2017


दर्शन पिछले दशक का

प्रिय फेसबुक, मेरे लिए तुम एक ऐसे डायरी के पन्ने की तरह हो जो पूरे दिन का हिसाब किताब सबके सामने रखते हो। बस दिक्कत ये है कि तुम्हें पीछे जाकर पलटने में बहुत दिक्कत होती है, फिर भी ऐसा लगता है कि तुम कुछ वर्षों बाद कोई न कोई मेमोरी मेरे सामने भेज ही दोगे।
........................
दर्शन पिछले दशक का
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छुट्टी का दिन है और होता भी क्या है इस दिन। हफ्ते भर की ऑफिस की थकान मिटा लूं । सोचते तो अक्सर हम सभी हैं। लेकिन आज क्या हर हफ्ते की कहानी ऐसी है कि थकान अगले दिन ही मिट पाती है। घर के राशन पानी लाने से लेकर पहनने तक के कपड़ों का बंदोबस्त अगले पूरे हफ्ते भर के लिए करना होता है। नींद खुलने के बाद अंगों का मशीनीकरण इस कदर हो जाता है कि कपड़े साफ करने और घर की सफाई करने के बाद कमर टूटने लगती है। कभी नहीं सोचा था कि ये जिम्मेदारियाँ शादी होने के पहले भी आ जाती हैं।

आज के दिन मेरी सुबह उस समय हुई जब सूरज बीचो-बीच आकर अस्त होने के लिए थोड़ा करवट बदल रहा था। रात में आफिस का काम करने के बाद मानो सब कुछ बदल गया है। सूर्योदय देखे अरसा बीत गया, और तो और कोयल की कूंक और कौवों का कांव सुने तो पूरे एक दशक हो गए। सब अच्छा लगता है। हां फिर भी सब अच्छा चल रहा है। दिल्ली है यहां तो जबसे कमरे के अंदर बल्ब की रोशनी मिलने लग गई तब से आज तक सूरज की रोशनी का अर्थ ही अप्रासंगिक हो गया। किसी प्रकार पिछली रात को सोने का मतलब मेरा यही होता है कि सुबह हो गई, यानी रात जो सोया करते थे आज कल सुबह नींद आती है और उसे हम अनायाश ही बोल देते है "रात"....मुझे लगता है कि अगली पीढियां हमारी कहांनियों में रात दिन का अंतर करना भूल जाएंगी।
सुबह सो कर उठने का टाइम वही करीब दोपहर के एक बजे रहा होगा। जल्दी से नित्यक्रिया का काम निपटाने के बाद अचानक ही बिना किसी योजना के अपने पास के नार्थ कैंपस जहां पर पूरा एक दशक गुजर गया, वहां जाने के लिए निकला। सबसे पहले मॉडल टाउन होते हुए पटेल चेस्ट की रेड लाइट पर किंग्सवे कैम्प होते हुए पहुंचा, तो एक दृश्य याद आया.....
"अरे प्रभात जल्दी आओ, हम 7 लोग फाइल बनाने आये है, कैफे हैं आ जाओ...यहीं बैठकर फाइल कंप्लीट करते है।" यह मित्र आज आजमगढ़ हैं और मुलाकात को कई वर्ष हो गए।
अंग्रेजी के गाने और एक कॉफी के साथ इतने जल्दी फाइल टेपते हुए पूरी हो जाती थीं कि आज याद करके लगता है कि वहीं पर फिर लौट जाऊं"
कैम्प से आगे पटेल चेस्ट के नाले के पास पहुँचकर नाले के दुर्गंध के बीच एक मयखाने के दृश्य की झलक देखने को मिलती है....
"सीढ़ियों पर चढ़चढ़ कर बुरा हाल हो गया और मीरा मेरा पिछले आधे घण्टे से इंतजार कर रही थी। मेरे पहुंचते ही मानो उसे सांस में सांस आया। वह खुश हो गई। मीरा के पास पहुंचकर सबसे पहले लगा कि वह कितने दिनों पहले से उसे जानता है। शाम को धीरे - धीरे जब मयखाने से महुए की खुशबू आने लगी तब उसने मीरा को भी उसमें मदहोश कर दिया। मैं तो हर बार की तरह मयखाने की मदहोशी से बच निकला लेकिन नए साल के पहले दिन मानो उसका असर मुझ पर भी इतना गहरा पड़ गया कि वह दिन आज भी याद कर मेरी सांसें ऊपर नीचे होने लगती हैं।"
क्रिश्चियन कॉलोनी के पास का एक दृश्य
"आज खुशी इतनी थी कि लगा कि जिंदगी का असली मतलब यही है। एकता का अर्थ तब समझ आया। एकाकी का अर्थ अब समझ आया। वे दिन जब उबर ओला के इंतजार ने हम सबको एक साथ कर दिए थे। उबर में बैठे मुझे ऐसा एहसास होने लगा था कि यह हमसफ़र यूँ ही बना रहेगा। गाड़ी की रफ्तार कम न हो। यह पल यूँ ही रुक जाए। यही सोच रहा था, लेकिन होना तो ये नहीं था। बिखराव भविष्य को मंजूर था...."
अब मैं अपनी स्कूटी को क्रिश्चियन कॉलोनी से आगे जंतु विज्ञान विभाग की ओर बढ़ाता हूँ..
काल करता हूँ, मित्र का फोन नहीं लग रहा था
सो लैब सीधे पहुँचता हूँ, एक सज्जन टकराते है......सर हेयर यू आर रिसर्च स्कॉलर...आई वांट यू टू डिस्कस अबाउट सीएसआईआर एग्जाम...यू आर जेआरएफ....व्हाई यू र नॉट ट्राइन्ग.... इवेन यू डिड योर एमएससी इन बॉटनी फ्रॉम डीयू.....आई केम हेयर टू प्रीपेयर नेट आफ्टर सिविल प्रीप्रेशन। सारे प्रश्नों के जवाब देने का मतलब अपना पूरा दिन खराब करना था। सिंपली आई एम डूइंग समथिंग एल्स....
खैर अब उनसे पीछा छुड़ा अपनी साथी से मिलकर किसी तरह जंतु विज्ञान विभाग से बाहर आता हूँ। खबर मिलती है कि आपके एक मित्र असोसिएट प्रोफेसर बन गए है...सोचा कि कॉल मिलाता हूँ मुलाकात हो जाये....खैर पता चला वो अभी बाहर है...फिर वनस्पति विज्ञान विभाग की ओर मुड़ता हूँ और पाता हूँ कि मैं अभी कितना अकेला हूँ। दो चार साथी जो मेरे कभी बहुत करीब हुआ करते थे आज वे बिल्कुल भी टच में नहीं है और फोन लगाने पर लगा भी नहीं। मुलाकात तो किसी से नहीं हो सकी.....केवल एक दृश्य पुनः आंखों के सामने आता है
"परीना और मैं दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े चले जा रहे हैं नहीं पता था कि ये हाथ यूँ ही कभी एक दूसरे से मिलेंगे पता तो कुछ भी और नहीं था लेकिन इस समय को आगे बढ़ाते हुए मुझे वह पल याद आया जब परीक्षा के बाद चाय पर शाम को कप सटाये सब एक दूसरे की ओर देख रहे थे"
अब वनस्पति विज्ञान विभाग की ओर से होते हए आर्ट्स फैकल्टी के गेट पर पहुंचा
एक दृश्य पुनः आंखों के सामने आया
"चलो आज हम सब रिपोर्टिंग कर लेते हैं, सीआरएल की ..तुम लिखो, और मैं पूछता हूँ ...प्रश्न....ज्ञान देने वाले भी लोग बहुत मिले थे"
हां वह पल भी था, जब एक दिन हंसराज होस्टल से करीब 12 बजे रात को मित्रों से परेशान होकर आंखों में आंसू लिए बक बक करता खुद से विवेकानंद की मूर्ति के पास बैठा आसमान को देख रहा था, इतना ही नहीं वह दिन भी याद है जब पिता जी जेल में थे और मुझे यह खबर सुनकर रोना आ रहा था....खूब रोया था उस दिन विवेकानंद की मूर्ति के पास बैठकर।
अब स्कूटी की रफ्तार तो कम हो गई थी....लेकिन इस भंवर से निकलकर लगा कि एक बार को माल रोड चल लिया जाए...सबसे पहले गवायर हाल जहां मैंने अपने 2 साल बड़े मस्ती से गुजारा था। वहां आकर नाई की दुकान के पास दाढी बनवाने पहुंचा...
अक्सर हर बार जब भी इधर आया तो इसी सैलून पर आया, मानो इस सैलून और नाईयों से काफी अच्छा दिल का रिश्ता है जो कभी छूटने देता ही नहीं।
रविवार के दिन तो अक्सर हर हफ्ते आकर इसी सैलून पर ए आई आर एफएम के गानों के साथ बाल कटाने बैठ जाता था
अब दिल किया, क्यों न वीकेआरवी के पराठे और चाय पर चल लिया जाए... आलू प्याज और पनीर के पराठे एयर गर्म चाय की चुस्कियों के बीच वह चारू के साथ का बीता वक्त ध्यान आ पड़ा
"चारू पता नहीं क्यों मुझे देखे जा रही थी और वह मुझे इस ओर इशारा कर रही थी कि तुमने जो बीते पलों को अपने साझा किया उन पलों के अतिरिक्त इस पल को भी समेट लो जिसके बाद हम और तुम इसके बाद शायद एक दूसरे के बेहद करीब हो जाएंगे।...हुआ भी यही हम वह शाम कैसे भूल जाएं जब नेट का एग्जाम देकर घंटों शाम को इसी कैंटीन में बैठ एक दूसरे की ओर मुस्कुरा रहे थे।"
अब साँझ ने तो मुझे इतना डुबो दिया कि मैं सोचने लगा कि यहाँ दुबारा किसी से मुलाकात न होगी बस यादों में ही ये मुलाकात कितना घुमाएगी।
इसके बाद मुखर्जी नगर की ओर मुड़ा एक किताब की खोज में घंटों बाद नेहरू विहार के नाले की ओर देखने लगा....वही नाला जिसके पास से आते जाते उन पन्नो को उल्टा करते थे जिनके लिए परीक्षा केंद्र कभी यूपी के इलाके तो कभी राजस्थान और एमपी टहलाया करते थे। वो दिन भी याद है जब मेरठ परीक्षा देने के लिए सुबह 4 बजे मुखर्जी नगर में बस में बैठा था और बस खराब हो गईं थी। मेरे मित्र परीक्षा के एक दिन पहले नींद की इतनी भयंकर गोली ले लिए थे कि उनसे उस दिन परीक्षा हॉल में पहुँचा ही न गया। दिन भर वो सोते रहे।
खैर इन यादों से मुलाकात हो गईं तो लगता है वो बीते दिन लौट आए ....लेकिन ये दिन जो लौटे हैं, वो कभी खुशियां देती हैं तो कभी उन्हीं के साथ खूब रुलाती हैं। बहुत मुश्किल है इन्हें भुला पाना। उससे भी ज्यादा मुश्किल है लोगों को भूल पाना। जो आज हर स्थानों पर अपनी पहचान छोड़ गए हैं। स्कूटी से चलना क्या पैदल चलना दूभर हो जाता है जब इन यादों के चक्कर मे पीछे हॉर्न बजाते रिक्शे, कार, ट्रक सब मुझसे परेशान हो जाते है और कभी कभार मुझे कुछ देर बाद समझ आता है कि मैं यादों से सड़कों पर गुजर रहा हूँ न कि किसी के साथ ।
-प्रभात
15/09/2017


Tuesday, 19 September 2017

हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते

 जरा मुझे भी सुनिए, हम नहीं कहते
हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते
जिंदगी ने गम दिया तो भी सुकून है
हर कदम पर मजबूरियां है, नहीं कहते
बात हो रही है आपकी सरकार!! हम तो क्या हैं, इंसान.....न....शैतान........न.......तो फिर मेरे रिक्शे पर बैठी साहिबा की ......शब्द भइया...... न.....मैं असल में इज्जतदार कभी रहा ही नहीं। परिश्रम करते करते जिंदगी ने मुझे शाम के खाने के लिए गुटका दिया, वो भी लोकल.....भाड़े से देशी दारू कभी कभार.......और इस हड्डी को मजबूत करने के लिए .........लाल मिर्च वाला खाना, जो काले पानी में पकाया जाता है। ये तो रही खाने की बात और इज्जत की बात।
अब देखने और समझने की बात यह है.....
रात को रहने के लिए फुटपाथ की जगह (जिसे सफेद कुर्ते वाले अक्सर मेरे कर्म का नतीजा करार देते हैं) है....जहाँ से झनझनाते ट्रक की बयार, टायरों की रगड़ और उसमें पिसते आम लोगों की संवेदनाओं के बीच मेरी जिंदगी ।
हां मेरी जिंदगी......
जो असल में है तो दिखने में है तो बहुत बेकार
लेकिन अंदर से बहुत अच्छी भी है....
नींद आ जाती है बिना दवा लिए.....बिना पंखे के......बिना सोफे के .......बिना तकिये के....
बिना घर वाली के........बिना जिंदगी के।
अब पहनावे की बात भी सुन ही लीजिए...
नहीं नहाता ऐसा नहीं है, डेली नहाता हूँ, धूल से पसीने से और कभी कभार खून से ।
लेकिन शाम को अक्सर काली यमुना के किनारे बिन साबुन लिए 5 रुपये देकर शौचालय में जानी की आदत है.....कभी कभार पेनाल्टी के रूप में मेरी आधी कमाई वर्दी को चली जाती है.......गिड़गिड़ाहट में मेरे तन पर पड़े वो फटी कमीज का टुकड़ा भी फटकर रुमाल बन जाता है। दाढ़ी बढ़ जाती है तो पागल की तरह रोड पर चलते हुए मुझे एक रुपये की भीख किसी भक्त से मिल जाती है जो अक्सर चढ़ावे में हजार रुपये से कम मंदिरों में चढाना अपराध समझते है।
तो अब तो समझ गए होंगे मनुष्य के लिए 3 चीजें कौन सी जरूरत की चाहिए....खाना, रहना, पहनना
और ये तीनों ही से वंचित हम मनुष्य नहीं है.....इसलिए हम कुछ नहीं कहते केवल फुटपाथ पर रात को सोते हुए आसमां का एक चक्कर जरूर लगा लेते हैं..
फोटोग्राफी: प्रभात (कूड़े वाली)
फुटपाथ (गूगल)
-प्रभात



गजब हो गया!!

गजब हो गया!!


कहाँ प्रभात क्या तुम भी, जिंदगी जी रहे हो तो बस जीते चले जाओ मत सोचो क्या अजब हुआ, या गजब हुआ। होने दो।

सच!!! जानता तो मैं भी हूँ, ये खट्टे मीठे अनुभवों के अलग ही आनंद है, लेकिन ये आंनद ठीक वैसे ही होते जैसे "मयखाने में गुजारे पल" तो अच्छा ही होता। मगर यहां तो सब कुछ वास्तविक है में भी- वो भी, इतना ही नहीं साक्षी हैं वो चारों दिशाओं की हवाएं, वो भूमि से आने वाला जल, वो बारिश, वो पै
रों की रज,हँसी,चेहरा और बहुत कुछ..........किस-किस से कहूंगा कि मेरी मुलाकात किसी परीना/रागिनी/मीरा से कभी हुई ही नहीं।

फिर भी अब जो हाल है, उस हाल में मेरा होना गजब हो गया।

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हाल दिल का अपने बता जो दिया, मेरा उनसे बताना गज़ब हो गया।
मालूम नहीं था इश्क का अंजाम, वो रात का मिलना
गजब हो गया।
कौन खोता है प्यार कौन रोता है, जब उनको मुझसे शिकायत न थी
हर घड़ी करते मुझसे सवाल, इजहार मस्ती में करना गज़ब हो गया।
कितने सवालात कर गई हमसे वो, घड़ी दो घड़ी 
मुलाकात में
सिसकियां इस तरह फिर से भरी कि आंखों का भरना गज़ब हो गया।
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सपनों में ही आती तो, राह चलते अब दिखना उसका गजब हो गया।
हर तरफ देखती हैं आंखे उन्हें, उनका न दिखना क्या गजब हो गया।
न पता हो उन्हें, चाहेंगे उन्हें हरदम, मेरा उनसे बताना गजब हो गया।

-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार



झोपड़पट्टी से निकला....


Monday, 4 September 2017

दृष्टिपात पत्रिका में "दर्पण"


अरे भाई गाली देने से पहचान होती है?

अरे भाई गाली देने से पहचान होती है?
बचपन से आज तक किसी को गालियां नहीं दी। किसी को साला तक नहीं कहा। शब्द निकलते ही नहीं मानो। हां बचपन में हम भाई बहन कुत्ता और कुत्ती शब्द का इस्तेमाल जरूर कर लेते थे। गालियां देता नहीं था लेकिन जब किसी के द्वारा मुझे गालियां मिलती थी, तो ग्रेजुएशन तक तो ये हाल था कि सीरियसली लेकर भावुक हो जाता था। कभी-कभी तो चिल्ला देता था। किसी ने हल्का सा डाँटा तो लगता था कि अपराध बिना ही ये डांट क्यों दी गई क्या वह नहीं जानता कि मैं सबसे अलग हूँ। रैगिंग में गालियां देने को कही गईं तो आँसू निकल आए, सब कुछ किया लेकिन गालियां मुँह से निकले नही। इन सबके लिए मेरे घर का आदर्श वाला माहौल और बचपन में पढ़ी नैतिक शिक्षा की कहानियां, बुद्ध की जीवनी आदि जिम्मेवार हैं।
                                                     
                                           

बात ये नहीं है कि मैं गालियां नही देता, बात ये है कि एक लड़का गाली नहीं देता। रोना तो कहा जाता है स्त्रियों के लक्षण हैं और पुरुष तो कभी रोते नही वे कठोर होते हैं। ऐसा अगर होता है तो मेरे जेंडर पर प्रश्नचिह्न लग जाता है। इतना नरम दिल के पुरुष को आप देख के कह देंगे कि कठोर बनिये। जो हूँ उससे बहुत लोगों को एतराज होगा। भाई सिंपल सी बात है लड़का होने का मतलब ये नही कि इमोशन्स उसके पास नही होंगे। किसी में कम होते है तो किसी में ज्यादा। लड़की होने का भी मतलब ये नही कि वह बहुत सॉफ्ट ही होगी वह परिवेश के हिसाब से कम इमोशन्स को धारण कर सकती है।
इन सबके बावजूद ये लॉजिक नहीं समझ आया कि गालियां किसी का व्यक्तित्व तय कैसे करती हैं? आज कल गालियां देने वाले लोग बड़ी सोसाइटी के होने का दावा करते है। गालियां और शराब का बहुत बड़ा लिंक है। और इसमें अगर सेक्स जुड़ जाए तो समझिए कॉकटेल जो बना वह बहुत ही स्टैण्डर्ड क्लास का हुआ। लड़कियां गाली देकर पुरुषों के जैसा बनना चाहती हैं। सिगरेट का नशा करके मानों वे कॉकटेल बना रही हैं स्टैण्डर्ड होने का। आखिर क्या पुरुषों के पहचान गालियों से तय होते हैं, उन चीजों से ही बराबरी करना है आपको भी जिन चीजों में अश्लीलता हो। जो न तो पुरुष का कॉपीराईट हो न ही महिलाओं का । इसका अगर समाजीकरण भी हुआ है तो समाज के सबसे स्टैण्डर्ड क्लास के लोगों द्वारा ही हुआ है, जो अंदर से खोखले ही हैं। जिंदगी में यही समाज के लोग अपनी हैसियत दिखाते है और महिला और पुरुष होने का प्रमाण देते हैं। बात बस इतनी सी है कि गालियां दो, खूब दो लेकिन इसको ग्रहण न करने वाला मनुष्य ज्यादा खुश दिखेगा। चेहरे पर चिड़चिड़ापन उसके नही होगा। गालियां मैं नही लेता और न ही देता हूँ तो क्या अब तक का जीवन मेरा गालियों के बिना अधूरा रहा? बल्कि मैं शब्दों का बाड़ चलाना सीख गया हूँ कि गालियां देने वाले अक्सर माफी मांग लेते है, गालियां न देने से मेरे शब्दकोश में इतनी बढ़ोत्तरी हुई कि जिससे मैं इन स्टैण्डर्ड क्लास के लोगों को कभी भी मात दे सकता हूँ।
इसलिए नारी या पुरुष दोनों को वही लक्षण अपनाने चाहिए जो उनकी पहचान कराये, मगर जो वास्तव में स्टैण्डर्ड क्लास से लगते हो। आदर्श बन कर जीयें और ऐसा ही गुण अपने बच्चों में भी लाएं। गालियाँ कुछ नही बस गंदी मानसिकता को दर्शाती हैं । यह न तो पुरुष का गुण है और न ही महिला का।
-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार




तीसरी किताब (साँझा काव्य संग्रह) "कविता अभिराम"

कल मेरी तीसरी किताब (साँझा काव्य संग्रह) "कविता अभिराम" का विमोचन हिंदी भवन में संपन्न हुआ। इसके लिए मैं अयन प्रकाशन के संपादक और पूरे समूह का आभारी हूँ। साथ ही उन सभी रचनाकारों को बधाई देता हूँ, जिनकी रचनाएं इस पुस्तक में शामिल हुई हैं। लीजिये आप भी पढ़िए, मेरी उन रचनाओं को जो इस पुस्तक में शामिल हैं.....
विमोचन के अवसर पर Chanda GuptaPrincy Dureja और Ashutosh Mishra भी शामिल रहे, उनका भी शुक्रिया अदा करता हूं।
इसके पहले कविता अनवरत और काव्य संगम नामक दो पुस्तकों को आपसे रूबरू कराने का अवसर मिला था। ये सभी पुस्तकें इसी वर्ष प्रकाशित हुई हैं।

-प्रभात











Tuesday, 29 August 2017

गम है उसको भुला रहे हैं

हम इस तरह मुस्कुरा रहे हैं
कि गम है उसको भुला रहे हैं
हम चाहते है जिसे खुश रखना
वो हमीं को खूब रूला रहे हैं
जो भुलाए नही जाते ख्वाबों से
वो हमको ही अब भुला रहे हैं
माना कि चोट पहुँची तुम तलक
एहसास है तभी सहला रहे हैं
कदम-कदम पर मनाया है उन्हें
क्या दर्द है उन्हें जो इठला रहे हैं
कहता हूँ प्रेम से देखो एक बार
सोचो प्रभात क्यों चिल्ला रहे हैं
-प्रभात

Thursday, 24 August 2017

प्रेम का सहारा कितना सच? कितना झूठ??

भागदौड़ भरी इस जिंदगी में हर कोई त्रस्त है। मैं भी और आप भी। कोई कहता है मैं मस्त हूँ तो कोई कहता है कट रही है और कोई कहता है पूछो न....। कौन कहेगा कि मैं अपनी जिंदगी में खुश हूँ, यकीनन आप होंगे मगर आप जब खुद अपने पूर्व के किये कार्यों की समीक्षा कर रहे होंगे तो आप पाएंगे कि अभी ज़िंदगी में खुशी लाने के लिए कुछ कार्य शेष बचे हैं।
स्वार्थी मनुष्य का चरित्र और इसके बाद हर किसी से बेवजह कुछ पाने की उम्मीद कर लेना शायद बहुत हद तक परेशानी का कारण है। बिना कुछ खोये मनुष्य न जाने क्या क्या प्राप्त कर लेना चाहता है। युवाओं खासकर जो असल जिंदगी में मानसिक और शारीरिक विकास कर रहे होते हैं वे अपने विकास की दौड़ में बहुत सारी खूबियों को पीछे धकेलते हुए उनसे बचने के लिए ऐशो आराम की जिंदगी ढूढ़ने लगते हैं।



युवा अपनी ज़िंदगी मे भविष्य का ध्यान रखे बिना अपने पार्टनर की खोज करने लग जाता है। अचानक कभी कभार उसे जब भी कोई किसी वजह से पसंद आ जाता है तो उसे सब कुछ मानने लगता है और एक दिन फिर वही दोस्त कहलाने वाले जोड़े एक दूसरे से बहुत दूर दिखते है। ब्रेक अप और पैचअप की संस्कृति ने माहौल को इस कदर बना रखा है कि इससे रिश्तों की सारी धरोहरों का सर्वनाश हो जाता है। अबूझ पहेली एक नए रूप में सामने आती है और बिखराव दिखने लगता है। मान- मर्यादा, शान- शौकत, ऐशो- आराम सब कुछ चली जाती है, बचता है बस उदास चेहरा और कुछ एक बातें, गलतियां और उन गलतियों पर टिकी प्यार की निशानी, यादें और उन यादों के बदले कांच की बोतल में भरा रेड वाइन । पब का डांस और झूमता शहर। बर्बाद चेहरा और इस बर्बादी में बर्बाद शरीर और प्यारा मन ।
अक्सर देखता हूँ, कि फेसबुक पर मित्र बनते है, व्हाट्सअप पर मेसेजेस होते है। कहीं अचानक किसी आफिस में मुलाकात होती है, किसी स्थान पर थोड़ी देर के लिए मुलाकात होती है। अचानक कुछ दिनों बाद दो लोग एक दूसरे के काफी करीब आने लगते हैं और मैसेज और कॉल पर ही "आई लव यू" का मैसेज पहुँच जाता है। कोई बाधा अब बात करने से दूर नही करती। इस मैसेज का अर्थ अगर वास्तव में प्यार करना है तो ब्रेकअप और पैचअप का अर्थ ही नही रह जाता। जिंदगी में उदासी दिखेगी भी तो वह दूर हो जाएगी। प्यार में वह शक्ति है जो कभी 2 लोगों को जुदा कर ही नही सकती। अगर ये हकीकत है तो लोग ये तीन शब्द बोलकर अपने फ्यूचर का परवाह किये बगैर ये सब क्यों करते है। अक्सर जब एक बार ऐसे मैसेजिंग हो जाते है तो इसका मतलब दोनों को प्यार की जरूरत है। जिंदगी में वे बहुत हद तक हारे हैं। वे केवल अपने जीवन में एक दूसरे के सहारे बन सकते है। मानसिक सपोर्ट दे सकते हैं।लेकिन होता तो अक्सर इन सबके विपरीत है। समझ नही आता कि लड़का या लड़की इस मैसेज को कितना समझ कर और किस चाहत में आगे बढ़ रहे होते है।
कुछ दिनों तक एक दूसरे से सब कुछ ठीक चलता है लेकिन कुछ परिस्थितियों में वे इसी ठीक क्रम में रिश्तों को बहुत जल्दी आगे ले जाना चाहते है। प्यारी लड़की या लड़का जो भी अनजान होते है वे एक तरफ से ज्यादातर केसेज में यूज "प्रयोग" हो जाते है। जिस्म की चाहत और काम वासना में ले जाकर वे केवल प्यार का एक कोना तक पढ़ने की इच्छा रखते है लेकिन प्यार की असली हकीकत से अनजान रहकर वे मानसिक गुलाम बन जाते है। अब तक उद्देश्य क्लियर हो जाता है लेकिन काम वासना की भूख में वे इतने फंस से जाते है कि वास्तव में प्यार की तरफ जाने वाला उनमें से एक अपने पार्टनर को भी अपने जैसा ही समझ कर उससे अपनी केयर करने का सौदा कर लेता है। हकीकत यह है उसका एक पार्टनर इतना चालाक होता है कि वह पहले से फिक्स गोल के मुताबिक उसे अब छोड़ना चाहता है। लड़की और लड़का जो कभी नही चाहते ये साथ छूटे वे इससे बाहर निकलने में कई-कई महीने तक मानसिक गुलामी में जीते रहते है। प्यार की यह हद होती है सब कुछ जानकर वह अपने पार्टनर को प्यार की नजरों से देखता है। वह जानता है कि प्यार में ऐसा नही होता कि यहां छोड़ दो और फिर कहीं जाकर वही दुबारा से काम अंजाम दो, लेकिन सत्यता इस जिंदगी की यही है कि ब्रेकअप के दौरान अक्सर कोई केयर करने वाला इंसान दिखता है जो अब उसकी जिंदगी में आ जाता है और फिर अब वह वही सब करता है। इस प्रकार या मिथ्या प्रेम का नाटक चलता रहता है। कभी अंत नही होता और जो भी इसका शिकार होता है वह भी किसी दूसरे के साथ न चाहते हुए भी ऐसा करने को मजबूर हो जाता है।
इस मिथ्या प्रेम में अक्सर वही बातें है कि कभी भी सच और आदर्श का सहारा लेकर आप आगे नही बढ़ सकते। कभी जिंदगी में अवसरवादी बने बिना आप खुश नही रह सकते। कभी प्यार के वास्तविक अर्थ को अपनाकर जिंदगी को जी नही सकते। कभी रिश्तों के वास्तविक मकसद को नही समझ सकते। घर परिवार में सब रिश्ते बस दिखावटी ही होते है, कभी सूकून नही पा सकते। विवाह होने पर भी अनैतिक संबधों का जाल कभी नही छोड़ सकता। हर कोई शिकार बनता ही रहता है।
अक्सर ऐसे ही तमाम किस्से होते है जिनमें ब्रेकअप के चक्कर में जिंदगी के उन तमाम बुराईयों को वे ग्रहण कर लेते है जिन्हें वे नही चाहते। बारहवीं क्लास से निकलने के बाद बहुत सारे ऐसे उदाहरण देखने को मिलते हैं जब ग्रैजुएशन आते आते वे किसी से ऐसा ही प्यार कर बैठते है और यह संबंध टूटने के बाद नशा करने लग जाते है और उबरने का भरसक प्रयास करते हैं। वे उबर तो जाते है लेकिन ऐसी तनाव की स्थिति में आप हमेशा ही नशे को सर्वोत्तम हथियार के रूप में मानने लगते है। अपनी मानसिक स्थिति की तुलना करें तो देखेंगे कि हम तब ज्यादा अच्छे थे, स्वस्थ थे जब तनाव नही था। तनाव से दूर जाने के लिए नशा भी नहीं था। लेकिन इन सबके अतिरिक्त एक चीज और थी कि हमने अपने प्यार के लिए जो इनर्जी खर्च की संबधों को बनाए रख पाने के लिए वह भी उस समय नही था। आप हर चीज को अच्छे ढंग से सोचते थे। पहले आप मिथ्या प्रेम को प्रेम ही समझते थे। किंतु अपने पार्टनर के चक्कर में आप इतने सावधान हो गए कि अब आप मिथ्या प्रेम का खेल खेलने लगे। हालांकि आप हो सकता है कि सुधर भी गए हो। परंतु किसी को सुधार नही पाए, बल्कि उसे भी उलझा दिए तो ये आपकी गलती है।
-प्रभात
फोटो : गूगल से उधार
नोट: इस लेख से किसी भी परिचित व्यक्ति का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष संबंध नही है। यह जनहित में जारी है।


बस यूं ही!!

प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा।
तेरे रग-रग में बसकर अपनी याद दिलाऊंगा।।
और कितनी रातें बीतेंगी ऐसे करवट बदले-बदले?
अब फिर क्या कभी वैसा अधिकार जमा पाऊंगा?
नही! फिर भी अपना होने का एहसास कराऊंगा...
प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा।
इन स्वप्नों की दुनिया में कब तक खोना होगा?
छूकर आसमान बादल में कब तक रहना होगा?
नही पता! बस हर दिन एक आस लगाए जाऊंगा...
प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा।
गुजरी थी जो हवा छूके हमको, पास कभी आएगा?
उस खुशी के अंतिम बेला का मुस्कान कभी आएगा?
नही! तो भी इक-इक क्षण तुझे समर्पित कर जाऊंगा...
प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा...
क्यों होता है ऐसा सब कुछ अच्छा अच्छा लगता है?
जो बीते थे अच्छे दिन अपने वह लौट नही आता है?
नही पता! कभी तो आएगा वह पल जब मिल जाऊंगा...
प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा...
वक्त देखने लगा है हमको तो कब तक देखेगा ऐसे?
सब कुछ अच्छा है जब, तो परिणाम बुरा होगा कैसे?
नही! होगा जो होने दो, मगर विश्वास नही डगमगाउँगा...
प्रिये, फिर अपने हृदय की गहराई में जाऊंगा...
-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार



कहानी जो कही ना जाए !!

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अपने जमाने का कोई अगर पी-एच. डी. कर रहा है तो वो ये महाशय। एक बात और बारीकी का है वो यह कि डीयू से पी-एच. डी. । जब मिले थे वह साल था 2008 का, अपने होस्टल में होस्टल एंथम सुनाए जाने का। हमने रैगिंग तो दिया था, लेकिन अगर होस्टल एंथम अच्छे से सुना था जोर-जोर से "......मैं हूँ होस्टलर.....वार्डन की.... का गुलाम......" तो अज्ञात से।
मुझसे एक साल थे तो छोटे पढ़ाई में और आयु में भी, लेकिन कभी भाई साहब ने मुझे बड़ा समझ अलग नही किया।
आपके हुलिया की बात की जाए तो बस कादा कठ, मूंछे और दाढ़ी का कॉम्बीनेशन ऐसा लगता है कि किसी ऊपर के क्षेत्र से अवतार लिया हो।
2008 से लगातार छात्रावास की रौनक बने रहे। कभी छात्रावास सचिव, कुत्ता सचिव, कभी मेस सचिव, कभी दूध सचिव। ...देख रहे हैं ना। सब इनका खाने पीने से संबंध रहा है। बहुत कम खाते है, लेकिन पेट ऊपर आने पर सब कह देते है कि ज्यादा हो गया।
एक बार पूरी बनाया गया... आपको 10 पूरी देने के बाद कहा गया कि और ले लो...नही ज्यादा हो गया सर!!
अरे नही भाई खाओ ...कुछ नही होगा - मैंने कहा।
हा हिलाते हुए....हाँ सर! क्या हो जाएगा, लाओ सब दे दो। क्या हो जाएगा...खाना तो ही है मादरचो..!! अज्ञात साहब बहुत ही मजेदार लहजे में अपने ही बात का बचाव भी करते हैं।
आप मुझे और मेरे 4 साथियों को मेरे ग्रैजुएशन के बाद विदाई दिए उसमें इन्होंने मुझे एक डायरी भेंट किया...डायरी में मुझे इन्होंने इतना सम्मान दिया कि उसके पन्ने पन्ने आज शर्मिंदा है।
जी एक ऐसे शख्स और मेरे जमाने के दोस्त/यार/लड़का/सहायक/गुरू...वह सब कुछ हैं। जो मेरे हर घटिया और गिरी बातों को सुनते है और बैलेंस न होने पर बिना बताए ही खुद भी तब तक बात करते हैं जब तक उनका पूरा बैलेंस उड़ न जाये।
अज्ञात साहब को एक दिन मैंने बहुत जरूरी कॉल किया....अरे अज्ञात भाई ....मुझे मारने कुछ लोग आ रहे हैं और मैं हंसराज की कैंटीन में बैठा हूँ।। - मैंने बहुत डरे - डरे सहायता मांगा, शायद यही सब कुछ संभाल लेंगे।
मैं यकीन नही कर सकता था...इतनी बड़ी मुसीबत को कैसे टाला इन्होंने। ....अरे सर ये उमर अब हमारी नही है मारपीट का....लड़कीबाजी थोड़ी न करनी। हमारा लेवल है सर। आप खामोंखा ऐसा काम कर रहे हैं। ऐसे लोगों से बात ही मत करो...फोन ही मत उठाओ। दुनिया मे और भी काम पड़े हैं....मुझे लगा आज अज्ञात साहब तो मुझे शास्त्र ज्ञान और मेरा खुद से परिचय भी करा दिया। मान गए अज्ञात साहब।।।
अज्ञात साहब किसी काम के लिए मना नही करते। आज तक शायद ही कोई ऐसी परिस्थिति आई हो जब वे मेरी बात अच्छे से सुने न हो । कभी नाराज नही हुए। हमेशा दंडवत प्रणाम ही किया। अपने काम से काम...
इनके रग रग में पत्रकारिता और आदर्श राजनीति के गुण भरे पड़े है...ये सब इनको प्रकृति प्रदत्त प्राप्त है.
हिन्दू धर्म में पूजा पाठ करने का और रिश्तेदारी, गिरलफ्रेंडशिप तक का धर्म निभाने के लिए दिए जाने वाले उपहारों के बारे में समस्त जानकारी समेटे आप अज्ञात साहब देव लोक तक को प्रसन्न करने की जानकारी का ज्ञान मुझे सिखाते रहते हैं।
अज्ञात साहब डेली मुझे मेरे मंजिल तक ले जाने में प्रयासरत रहते हैं । अब साहब की जिंदगी की निजी कहानी यहां आगे का दूंगा तो आप शायद मुझे अब माफ नही करेंगे। क्योंकि आप पी-एच. डी. कर रहे हैं और ये डिग्री ऐसी है कि बिल्कुल आई. बी. जैसी जॉब के तरीके से काफी कॉन्फिडेंशियल है। इसमें मृत्यु हो जाये तो हो जाये....ज्यादे जांच पड़ताल नही करनी....क्यों मारे गए...या मरे।
फिर भी इसकी कहानी को कितने मज़ेदार तरीके से कहा है अभिषेक जी (मेरे फेसबुक मित्र) से सहायता प्राप्त !! जरा गौर फरमाइएगा... इसको जिसने लिखा उसका नाम ऐसे नहीं ले सकते क्योंकि बताया ना ये काफी कॉन्फिडेंशियल है.....ये अज्ञात साहब का नाम भी अज्ञात ही है क्योंकि आजकल सेंसरशिप में रहना लोग पसंद करते है...नाम डाल दिया तो दोस्ती चली जायेगी !!!
ये पेपर ...ये जर्नल ..ये रिसर्च की दुनिया
ये बालो की दुश्मन किताबो की दुनिया
ये पब्लिकेशन के भूखो लोंगो की दुनिया
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या हैं
हर एक स्कॉलर हैं घायल ..हैं रूह उसकी प्यासी
निगाहो मे उलझन दिल मे उदासी ..
ये लेब हैं या आलम बदहवासी ..
ये एनालिसिस अगर हो भी जाए क्या हैं ..
यहाँ बस चपरासी हैं हर स्कॉलर की हस्ती
ये बस्ती हैं बस बुड्ढे प्रोफसर की बस्ती
स्कॉलर्स की जवानी उनके बुढ़ापे से सस्ती
ये एक्सपेरिमेंट अगर हो भी जाए तो क्या हैं
स्कॉलर भटकता हैं यहाँ बेकार बन कर
जुगाड़ुओं क़े पेपर छपते हैं एहसान बन कर ..
ये दुनिया जहाँ दिमाग कुछ हैं नही ...
पेपर के आगे दोस्ती कुछ नही ..
वफा कुछ नही प्यार कुछ नही ..
ये पेपर अगर छप भी जाए तो क्या हैं ...
जला दो इसे फूँक डालो ये जरनल
मे्रे सामने से हटा लो ये थीसिस
तुम्हारी ही हैं तुम्ही संभालो ये लैब
ये थिसिस अगर एसेप्ट हो भी जाए तो क्या है ...
(सी एस आई आर -आई सी जी बी यंग साइंटिस्ट उवाचः )



 -प्रभात 

गांव जब शहर बन जायेगा

बहुत दिनों बाद गांव आकर गांव के बारे में लिखने को मन किया!!
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गांव जब शहर बन जायेगा
ये मिट्टी बदलेगी, ये घर बदलेगा
घर के बाबूजी पापा होंगे
और अम्मी जान मम्मी होंगी
जिस्म बदलेगा जमीन बदलेगी
रोशनदान होगी और रोशनी बदलेगी
घर की सारी सूरत बदलेगी
पेड़ बदलेंगे, गमला होगा
नक्श बदलेगा रूप रेखा बदलेगी
आदमी औरत बन जायेगा
गांव जब शहर बन जायेगा
छप्पर उजड़ेगा, ईट लगेंगी
तहखानों में तस्वीर लगेगी
किताब नही होंगे, लैपी होगा
दुनिया भर का चैनल होगा
टीवी चैनल, गेट का चैनल
योगा होगा तो जिम होगा
जिम में सिंथेटिक दूध होगा
रसायन होंगे, रसोई होगी
घर में दीपक नही बिजली होगी
आदमीं अब मशीन बन जायेगा
गांव जब शहर बन जायेगा
ताल नही नाली होगी
कीचड़ होगा, पानी होगी
मछली नही मच्छर मार होगा
घर-घर मे व्यापार होगा
रिश्तों का व्यापार, स्कूली व्यापार
घर में नौकर चाकर होंगे
पोछे वाली दादी अब बाई होंगी
व्यवहार नही बदलेगा
मगर सॉरी शब्द निकलेगा
आदमी अब गूगल बन जायेगा
गांव जब शहर बन जायेगा
आंगन में चहारदीवारी होगी
ग्वालिन, बिछु, सांप नही होंगे
घर में आर्टीफिशियल नाग होंगे
मोर नही नाचेंगे, कोयल नही कूकेगी
मुर्गा नही बोलेगा, अलार्म बोलेगी
गाय नही होगा, अमूल दूध देगी
खेत नही होंगे, पार्क होगा
राहों पे कोका और कोला होगा
आदमी हड्डी वाला हड्डी पचा रहा होगा
आदमी अब टिश्यू पेपर बन जायेगा
गांव जब शहर बन जाएगा
हवा नही, ऑक्सिजेन सिलिंडर होगा
आसमान नही, आसमानी छत होगा
चांद, तारे दीवाल पर अटके होंगे
रिश्ते व्हाट्सएप्प तक पे अटके होंगे
फेसबुक पर वाल बदलेगी
सेल्फी पर चेहरा नजर आएगा
किसी पर पर्दा नही नजर आएगा
बिल्डिंग होगी, घर का सामान होगा
इंसान नही होंगे लेकिन पहरेदार होगा
आदमी अब संवेदनहीन बन जाएगा
गांव जब शहर बन जायेगा
-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार



हुनर इस जिंदगी में

हुनर इस जिंदगी में जो सीखे, सब उसकी खुशी को लगाता हूँ
अपनी खुशी उससे मांगता हूं और वो खुद भी यही करती है
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियां दोनों को मयस्सर हो
चिता को देख लेगी शायद वो मगर चिंता नही छोड़ेगी
दिलों को बर्बाद कर ले शायद मगर वो कहना नही छोड़ेगी



आरजू मन की बस मन तक ही रह जाती है
राहें अलग हो जाते हैं, रास्तों में कीचड़ रह जाती है
लाख सजाए दीपक मगर अंधेरे में रहना है
शायद जिंदगी को जिंदगी बेवजह कहना है
हम दोनों ही नही समझते और समझना शायद चाहते हो
दीवार गहराई तक ले आए नींव में शायद बरकत हो
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियाँ दोनों को मुकम्मल हो

चोट बहुत करती है जब अचानक बिछड़ जाए
आंसू तभी बहते है जब बिछड़ कर फिर मिल जाये
मिलकर कभी इतना नही पा सके कि सम्मानी ए खुशियां हो
एक दिल पर उसका हाथ और एक दिल पर मेरा हाथ हो
इसे कौन कहेगा कि जिंदगी किताब बन कर ही रह जाए

हम कुछ भी हो, गुनाह इस जिंदगी का ही लगता है
शायद तोड़ दिया था उसका दिल जो अब तक जुड़ नही पाया
बेआबरू होकर नींद में घायल उसे भी कर रहा होता है
टूट गयी सारी तहजीब हमारी रिश्तों को जोड़ने में
शायद आंच आ गयी थी कभी हमारे दिल के तहखाने में
चाहकर भी शायद कभी ही कुछ मिल सका हो
हम ऐसा नही कर सके कि खुशियां दोनों को मुकम्मल हो

-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार




जिसे मैं सुनाऊँ

एक आह रुक गयी है, सीने की सीने में 
वो सुनने वाला ही कहाँ, जिसे मैं सुनाऊँ

मेरे खिड़की से आज भी वो दिखती है
उसके लौट के आने का इशारा कहाँ
निमंत्रण दर दर दिया रूह तक आने का
वो लौट जाती है, थोड़ी दूर आने के बाद
कचोटते है बार- बार, संवाद के तीखे शब्द
वेदना में लिख देता हूँ, पर बता न पाऊँ

हार मान लिया मैंने सच्चाई बताते-बताते
लम्हें निकल गए, छूट गए वादे- इरादे
बेशब्री था जिसका हमारी जिंदगी में 
आज, कल हो गया, हम अधूरे रह गए
राहें अलग भी न हुई, मंजिल वही रहा
चाहता हूँ कहूँ, तुमसे ही न कह पाऊँ

सोने लगा हूँ हर पल दिन में जख्म लिए
भींगता है स्वप्न दिन- रात, गहरा घाव है
मुनासिब नही ज़िंदगी में क्या, हवा चले
चैन से रहूं और पहले जैसे दिन रात ढले
खामोशी में है बरकरार, मेरा दिल सच्चा है
कह देना, शायद मैं कभी न समझा पाऊँ

-प्रभात
तस्वीर गूगल साभार