Thursday, 7 December 2017

सफरनामा

साझा काव्य संग्रह के लिए मेरी रचनाएं "सफरनामा" पुस्तक में प्रकाशित हैं। आप सभी इसके साक्षी बने, इसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ। 
यह मेरी चौथी साझा काव्य संग्रह की पुस्तक है।
25/09/17











 

पिताजी, इस कदर मुझे डर है

पिताजी, इस कदर मुझे डर है
आपके न होने का
कि मैं मर्जी से शादी करने की जिद
छोड़ देती हूं
मैं अपनी सारी खुशियों को
आपके सहारे छोड़ देती हूं
आपकी खुशी के लिए
क्योंकि जानती हूँ बेटियाँ 
शायद सब कुछ नहीं कर सकतीं
अगर कर भी सकती हैं तो 
शादी के लिए रिश्ते आप ही ढूंढेंगे
मैं अगर ढूंढ़ भी लूंगी
तो मुझे त्यागना पड़ेगा,
अपने प्रियतम को
अपने बंधनों को
अपनी खुशियों को
और अपने बचपने को
और सबसे बड़ी बात
मुझे कठोर बनना पड़ेगा
दिल और दिमाग दोनों से
मुझे असर नहीं करेंगी
ठंडी और गर्म हवा
जीवनरूपी रंगमंच पर
किरदार निभाऊंगी 
चेहरे पर खुशी होगी
अंदर से टूटी नहीं दिखूंगी
लेकिन मैं 
असंवेदनशील बन जाऊंगी......

प्रभात
तस्वीर: गूगल साभार



एक सुबह

*एक सुबह*
मैं दिवाली में घर गया और वापसी में जब ट्रेन पकड़ा तो माँ ने काफी गंभीरता से हर बार की तरह कुछ ऐसा ही कहा
कहाँ पहुँचे हो, सीट मिल गई, खाना खा लिया...मेरी कम बात करने की आदत है हां सब ठीक है कहकर, फोन रख दिया।
लेकिन.....शायद वह कुछ कहना चाहती थीं।

सुबह ट्रेन दिल्ली पहुंची मैंने कॉल कर कहा माँ मैं कमरे पर पहुंच गया। माँ ने कहा अच्छा, ठीक और सब बढ़िया है?
हां...मैंने कहा, लेकिन सवाल था और सब बढ़िया है तबियत ठीक है ऐसा पूछने का मतलब...कुछ और पूछना चाह रही थीं...क्योंकि मेरी तबियत गड़बड़ थी तो नहीं

अगले दिन फिर सुबह कॉल आया, सोते हुए 10 बजे मैंने कॉल उठाया और कहा हां अम्मी.....ऐसे ही किया हाल चाल पूछने के लिए, अभी उठ रहे हैं क्या, बहुत देर हो गई... माँ ने कहा।
हां आजकल 4 बजे तो सोता हूँ तो देर तक तो सोऊंगा
और कोई बात है क्या? सब ठीक है न?
हां.... माँ ने कहा
फिर 3 घण्टे बाद 1 बजे दोपहर दुबारा कॉल आया....मैं सोकर उठा था....हां अम्मी बताइए कैसी हैं....बस ऐसे ही किया अभी सो रहे हैं क्या.....माँ ने पूछा
हां अभी थोड़ी देर पहले उठा हूँ। और बताइए....मैंने सहज उत्तर दिया
अच्छा तो अभी तक कुछ खाए भी नहीं होगे?..इसलिए काफी कमजोर होते जा रहे हो....माँ ने कहा
हां अब उठेंगे लेट तो लेट ही खाएंगे...अभी वैसे कुछ खा लिए हैं खाना तैयार हो रहा है बाकी....मैंने कहा।
माँ ने कहा....अच्छा एक बात बताओ दिवाली में आए मैंने देखा काफी उदास से रहते हो, क्या हुआ कोई तकलीफ है क्या? इस बार काफी शांत-शांत से थे....कुछ किसी से बोलते भी नहीं थे...मेरे मन में सवाल उठ रहा था ....रहा नहीं गया मैं सोची पूंछती हूँ आखिर क्या बात है....कुछ हो बात तो बताओ उसको साँझा करोगे तो दूर होगी समस्या....बताओ किस तरीके की शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और पारिवारिक इनमें से कौन सी समस्या है...???
मैं सुनकर दंग रह गया, माँ तुमने मेरी खामोशी को कैसे पढ़ लिया.....मैंने कहां कुछ नहीं वो वैसे ही आपको लगा होगा।कुछ भी तो बात नहीं। मैं ठीक हूँ और ठीक रहूंगा।
माँ ने अधूरे मन से आश्वस्त होकर कहा ...ठीक है खुश रहना चाहिए.....
फोन कट गया, लेकिन मैं पूरे दिन माँ के ख्यालों में डूबा रहा और सोचता रहा...कि मां के लिए जितना लिखा जाए कम ही है...
उन्हें शब्दों में लिखा ही नहीं जा सकता...
माँ और मेरी जिंदगी
तेरे जीने का सहारा हूँ, बचपन से लेकर अब तक दुलारा हूँ माँ
तेरे दिल को जानता हूँ माँ, मेरी खामोशी को पढ़ लेती हो माँ
भीड़ में अगर मैं खो जाऊं तो दिन रात ढूंढ़ती रह जाओगी माँ
अक्सर ढूंढ़ता हूँ तुम्हें किसी और में, तुम मुझे ढूँढ़ लेती हो माँ
इसलिए माँ
मैं हवाओं में बहकर दूर चाहे जहाँ पहुंच जाऊं, तुम्हें शक तो होगा
मैं शून्य से धरा पर या धरा से शून्य तक चला जाऊं, वाकिफ तो होगी
मैं पत्ती बन पतझड़ में मुरझा भर जाऊं तुम्हें दर्द तो होगा
समुंदर में मैं कहीं डूब जाऊं तो गहराई का तुम्हें एहसास तो होग
मेरी खुशी का आधार तू है तो तेरी जिंदगी का आधार तेरा बेटा है माँ
मैं किताब हूँ और मेरे हर पन्ने को पढ़ लेती हो माँ....मेरी आँखों को और चेहरे को पढ़ने वाला तेरे अलावा कोई दूजा रिश्ता नहीं देखा माँ..
-प्रभात


यादों के झरोखों से

यादों के झरोखों से...




सुबह हो गयी है। छप्पर तले भागलपुरी चादर ताने नींद से जगा था। हर तरफ चिड़ियों की चहचहाहट और गायों की मी... की जोर जोर से आवाज आ रही थी। पास में आवलें के पेड़ पर बैठा पट्टू भी सुरीली आवाज में कुछ कह रहा था। कोयल की कूक के क्या ही कहने। दादाजी चारा काट रहे थे। मौसम ऐसा था....जैसे शिमला की हल्की कोहरे वाली सुबह...टिप-टिप की बजाय, बहुत हल्की बूंदा बांदी...गन्ने के ढेर आंगन से हटाए जा रहे थे। दादी कह रही थीं कि जाग जाओ भईया...उठो तो आज दीवाली है । का लेवक बा..जाता दिया, चूल्हा, घंटी...खेले वाला सारा सामान लइके कोहार आय हईं।
जल्दी से जागकर बैठे तो देखा हर तरफ घर की सफाई हो रही थी। आज स्कूल भी नहीं जाना था....लिपाई चल रही थी। जमींकंद की खोदाई हो रही थी। आंगन गोबर जी लिपाई से चमक रहा था। तुलसी के पेड़ के आस-पास मनोरम दृश्य लग रहा था। गुलाब की पंखुड़ियां पूरे वातावरण को महँका रही थीं। बछड़ा और पिल्ला सब खेल रहे थे। भौरें और तितलियां मंडरा रही थीं। दादा-दादी कह रहे थे कि पढ़ लो आज कुछ सब याद हो जाएगा। मैं सोचा इससे अच्छा क्या हो सकता है। सामाजिक विज्ञान की कॉपी निकालकर आग्नेय, अवसादी और रूपांतरित शैल सैकड़ों बार पढ़ डाला कि याद हो जाएगा आज तो दीवाली है...हां एक बात है। सबसे कठिन लगने वाला यह विषय मुझे याद हो गया।
अब शाम होने वाली थी। दिन-भर टहल-टहल कर खूब जाता से आटा पीसे और चूल्हा के ऊपर बटुली रखकर खूब पकाया।अच्छी-अच्छी मिट्टी की बनीं प्लेटों का जमकर फायदा उठाया। सुबह से मिठाईया खा-खा कर अघा गया। था। आखिर बच्चा तो और क्या कर सकता था। हां रात को दीपावली को लेकर इतने उत्साहित थे हम कि दिया रख रख कर थक गए थे लेकिन हारे नहीं थे। 200 दिया लिए थी अम्मी लेकिन उसे जिद करके 300 करा दिया था। दादी जी काजल बना रही थीं। और सभी लोग गणेश जी और लक्ष्मी जी की पूजा कर रहे थे। आस- पास के लोगों को मिठाईयां देने गए। अच्छे पकवानों में से मनपसंद मेरा एक पकवान पूरी और कंद की सब्जी खाने जा रहा था। दादा जी और घर के सभी लोग साथ बैठकर हँसी मजाक कर रहे थे। खाना खाते-खाते बोल उठा दादी जी ये बताइए आज राम जी कैसे लौटे थे....अब भी अयोध्या में कोई होगा? अच्छा अमावस की रात क्या है? ये सूप जो पीटा गया था एकादशी में ....ईश्वर आवें दलिद्दर जाएं...ये क्या है? इतने में नींद खुल जाती है....और पता चलता है समय बहुत आगे आ चुका है....आज दीवाली तो है मगर वो जश्न नहीं, आज सब कुछ वही है मगर वो लोग नहीं...सच में सब सपना बन जाता है।

मेरी दोस्त

-google
मेरी दोस्त मैंने तुम्हें एक ही खत लिखा था
पता था दोस्त, वो मेरा अंतिम खत था
मुझे पता नहीं क्यों यही लगा था, यह अंतिम ही है

लेकिन सच को स्वीकारना मुश्किल ही था
हां, न चाहते हुए भी लेकिन मैंने बताया था
कि यह तुम्हारे नाम मेरा पहला और अंतिम खत है
दोस्त मैं कवि नहीं हूं जो केवल कल्पना करु
मेरे ख्याल और मेरे शब्द सब तुम्हारी देन है
और लोग इसमें कवित्व के गुण ढूंढ लेते हैं
मेरी दोस्त अगर मैं कवि होता
तो मैं तुम्हारी होठों को मधु प्रेम बता रहा होता
और तुम्हारे चेहरे की चाँद से तुलना कर रहा होता
तुम्हारे घुंघराले बालों को मैं मोर मुकुट की
तरह शोभायमान कहता, और इतना ही नहीं
तुम्हारे आंसुओं को श्रृंगार बता रहा होता
लेकिन नहीं दोस्त,मैं वही कहूंगा जो तुम थी
मैं वास्तविक ही सुनाना पसंद करता
और सबसे बड़ी बात तुम खुद यही सुनना पसन्द करती थी
हां दोस्त, तुम्हारे केश हो या होठों का प्रेम
वो मेरे लिए था....और निश्चित रूप से वह ऐसा ही था
मैंने कभी अतिशयोक्ति नहीं बोला मगर
सच बताऊं तुम्हारी हाला वाले होठ भी मुझे 
बहुत मीठा अनुभव कराते हैं।
जिसे तुम सोचती की मुझे अच्छा नहीं लगेगा
या तुम कहती कि आज तुम अच्छी नहीं दिख रही
तुम फ़ोटो नहीं खींचा सकती
उस दिन भी मुझे वैसे ही लगती थी जैसे हर दिन
इतना आकर्षक की आज तक भूल नहीं सका हूँ
मैं चाँद को उतना नहीं याद करता,
मोर मुकुट देखने की लालसा नहीं हुई कभी
लेकिन मेरी दोस्त, तुम्हें देखे बिना एक कसक सी रहती है
मैं अपने आपको उतना ही खुशकिस्मत मानता हूं
जितना कि उस रात को 
जब हम एक ही चादर तले हाथ पकड़े मुस्कुरा रहे थे
जितना कि उस रात को 
जब तुम मुझे भेजने सड़क तक आई थी
उसके बाद तुम मेरी तरफ वैसे ही देख रही थी, जैसे मैं
जितना की वो दिन 
जब मेरे बोलने से पहले किसी को 
बता देती थे, कि ये ऐसा नहीं है या ऐसा है
तुम अपना हक जताती थे, और
बिना कुछ कहे मेरे कंधों पर अपना सिर रख देती थी
मेरी दोस्त, तुम्हारा शुक्रिया कहूँ तो अच्छा न होगा
क्योंकि शुक्रिया कहना तो हमने दोस्ती में छोड़ ही दिया था
शुक्रिया के बदले तुम्हारा जो स्नेह मिलता था
बहुत सुकून मिलता था
हां मेरी दोस्त, जो शरारतें थीं वो मेरे लिए तुम्हारा स्नेह था
पानी की बूंदों से भिंगोना, या तुम्हारा घर के दरवाजे पर आकर खड़े हो जाना
या कहूँ तुम्हारा मुझे कभी भी जगा देना 
और केवल मेरी तरफ एक बार देखना
मेरे सौ बार शुक्रिया करने से कहीं अधिक शुक्रिया के कायल हैं
वो रातें जिसमें तुम और हम एक दूसरे को अंधेरे में भी देख लेते थे।
वो मुस्कुराहटें जो लबों पर एक दूसरे की बिना चुम्बन किये ही जाती थीं
वो रातें जिसे तुम कहती थी कि मैंने कुछ गलत बोल दिया था
मुझे वो गलत भी सही लगता था
वो जगह जिस पर हम बैठे घंटो 
एक दूसरे को ढांढस बधाते थे
वो सब कुछ याद है न, मैंने सिर्फ इसलिए लिखा मेरी दोस्त
कहीं ऐसा न हो कि इन एहसासों को दबाएं ही मैं विदा जाऊं
मेरी दोस्त मैं छोड़ना चाहता हूं कुछ यादें तुम्हारे साथ भी
मेरी दोस्त, जानता हूँ, मैंने रुलाया है
तो खुद भी रोया ही हूँ
हां दोस्त जहाँ तुम रो रहे थे, वो दृश्य मेरी आँखें भिंगोने के लिए काफी है
कहां तक मैं कहूँ कि हवा तुम साक्षी थे
या कहूँ धूल तुम साक्षी थे....हां सभी थे।
तुम्हारी झल्लाहटें या तुम्हारे माथे पर चिंता की लकीरें,
मेरे लिए भी चिंता के विषय बनते
तुम्हारा डांटना कहूँ या 
वही मेरी जिंदगी और मकसद थे

मेरी दोस्त, तुम्हें और तुम्हें लिखकर मैंने गलतियां की
होंगी
लेकिन मैंने वहां वही लिखा जैसा सोचता हूँ, जैसा देखता हूँ
और इसलिए लिखा कि क्योंकि मेरी दोस्त तुम पढ़ो
कोई और नहीं क्योंकि दोस्त दूरियां हममे है
और असर दूसरे पर नहीं हम पर पड़ता है
उस वक्त जब हम बहुत दूर हो
इतना दूर कि कभी मिल भी न सके
इसलिए लिखा..........
फिर शायद तुम एक बार सोचो कि मैं क्यों लिख रहा था.....
लेकिन हां फिर भी तुम मत पढ़ना, क्योंकि ये प्यार 
कोई पढ़ने की चीज नहीं है, ये बस फील करने की चीज है
दोस्त तुमने जो सिखाया, वो ये कि खाना और उसके बाद दूध भी पीना है
हां दोस्त तुमने ये भी सीखा दिया कि ब्रश करना है
दोस्त तुमने मेरी माँ की तरह मुझे साबुन से नहाना भी बता दिया था
मेरी दोस्त ये कहने का अधिकार है न?
दोस्त मैं नहीं रहूंगा जब तो मेरी कविता तुम्हारे
जीने की वजह होगी
तुम्हें टूटने से बचाएगी
हां दोस्त तुमसे यह भी कहेगी कि उस पल में लौट चलो
लेकिन दर्द होगा बस इस बात की, कि नहीं समय कभी पीछे नहीं जाता
लेकिन खुशी भी होगी कि कोई दोस्त तो था सचमुच
हां मुझे तो खुशी ही है इसलिए दोस्त मैं चलता हूँ
आज नहीं रोऊँगा बस इतना ही कहूंगा
मेरी दोस्त मेरे इस जीवन में तुम्हारी जगह कोई और नहीं ले सकता
हां दोस्त..... तुमसे विदा लेता हूँ
लेकिन एक सवाल के साथ, आखिर तुम बिना कुछ मुझसे कहे कैसे रह लेती हो?
मेरी दोस्त,
जो बातें तुम बता देती थी मुझे जो किसी और को नहीं बताती थी
वो आखिर किससे कहोगी…?



मां-अम्मी

*मां-अम्मी*
मेरी माँ मेरी जिंदगी
मेरी माँ मेरी खुशी

मेरी माँ मेरा वो सब कुछ
जिसकी वजह से सांसे चल रही हैं
माँ तुम्हें अम्मी बुलाऊँ
या मेरी अम्मी तुम्हें केवल स्मरण कर लूं
मिलती है मन को तसल्ली
जीवन भर मांगा ही है मां
लेकिन इसके बाद भी
मेरी अम्मी बिन मांगे 
वो सब कुछ दे देती हो
जिसे कोई आज तक नहीं दे सका
माँ दुलार देना, गोदी का सहारा
हाथों से सहलाना, पुचकारना
मां तुमने आँचल से छिपाया, क्या नहीं बनाया
मेरे लिए कपड़े से लेकर कलम तक पकड़ाया 
माँ मन्नतें मांगी मेरे लिए, मां खुद बिन खाए
मुझे गरम रोटी ही खिलाई
अम्मी खुद के लिए जो नहीं कर सकी
अपने हिस्से की हर वो चीज मुझे दिलाई
मां तुमने जीवन दिया, पाला पोशा 
इसके बाद मां अब केवल मुझे तरसती हो
देखने को, इसलिए नहीं कि मां तुम अकेली हो 
इसलिए कि मैं कैसा हूँ
ये नहीं कहती मां कि मुझे जरूरत है तुम्हारी
ये नहीं कहती मां कि तुम मेरे लिए कुछ करो
मां मैंने हक जताया बिना हक के
मगर अम्मी तुमने कभी नहीं हक जताया 
कि तुम कोई आदेश दे सको
मां तुम निवेदन करती हो
इसलिए मां हो
लेकिन मां तुम एक पत्नी भी हो
मां तुम एक बहन भी हो
मां तुम एक बहू भी हो
मां तुम एक बेटी भी हो
मां तुम वो सब कुछ हो जिसकी वजह से मैं हूँ
अम्मी तुम्हारी चिंता की लकीरें बेशक मैं ना समझ पाऊँ
मगर मां तुम हमेशा ही मेरी चिंता की ही लकीर नहीं
मेरे भाग्य और मेरे भविष्य को भी पढ़ लेती हो
मां तुम मेरी अम्मी हो
मेरी माँ मेरी जिंदगी.....

-प्रभात


मैंने जीवन को देखा

मैंने जीवन को देखा है खूब गहरी खाई से
बैठा था आसमान पर, जमीनी सच्चाई से
मैं पृथक नहीं हूं क्षण भर, बाधाओं के आने से
अपने दिल की गलियों में पत्थर मारे जाने से
टूटा और हारा बहुत हूँ, जीता हूँ तो खुद से
कान के तार जुड़े हुए हैं डर लगता है कहने से
वक्त मिलता है सोच समझ कर कुछ कहने को
याद बनाकर अधूरे सपनों को फिर से जीने को
आंखों में आंसू आते है, मन हल्का हो जाता है
नहीं पता, जाते हैं तो फिर अचानक क्यों आते हैं
वो अलग थलग होकर भी नहीं चैन से रह पाते हैं
जिनकी वजह से आंसू आते उन्हें भी क्यों आते हैं
बुलबुला बन कर खो जाऊँगा मैं तुझमें होने से
तुमने छूकर देखा है दिल को बहुत करीब से
-प्रभात

मेरा भ्रम था

मेरा भ्रम था, मेरा सच बोलना
मेरा भ्रम था, कुछ अपना होना
मेरा भ्रम है अब खुद का होना
मेरा भ्रम है तुम्हारा होना
मेरा भ्रम है फिर भी है जीना
बिन भ्रम कुछ नहीं है पाना
बस चलते जाना, चलते जाना.....
ठीक वैसे जैसे कस्तूरी मृग
ठीक वैसे जैसे मृग तृष्णा
ठीक वैसे जैसे चाँद में जानवर
ठीक वैसे जैसे जल में रोशनी
ठीक वैसे जैसे परछाईं.....
देखते रहो धरती से आकाश को
देखते रहो समुद्र से बादल को
देखते रहो विश्वास से भगवान को
देखते रहो इंसान को गुमान से
धूल से दीया और दीया से बाती को
दीया से धूल को और धूल से माटी को.....
चाहो तो जिंदगी को मौत से निकालो
चाहो तो जिंदगी से मौत निकालो
विश्वास है तो भूत है, भूत है तो भविष्य है
ईश है, देव है, अरूप है तो रूप है
सत्य है तो झूठ है, भ्रम का प्रमाण है
प्रमाण है, क्या है? कुछ भी नहीं......
भ्रम है या ये भी नहीं?????????
-प्रभात


Tuesday, 10 October 2017

जाने दो

 *जाने दो*
वो जाते हैं तो चले जाने दो
कभी किसी को पछताने दो
मुड़ कर देखो मत कुछ
उनको भी आगे बढ़ जाने दो
कितना भी मुश्किल आए
लबों को मुस्कुराहट लाने दो
पढ़ लो अनगिनत कहानियां
दूसरों को खामोश हो जाने दो
ढूंढ लो एक रिश्ता और किसी में
किसी रिश्ते को बिछड़ जाने दो।
रास्ते हर बार नई आने दो
कदम अपने रुक न जाने दो
हार हो तो स्वीकार कर लो
किसी की जीत तो हो जाने दो
आंसुओं को कभी रोको नहीं
इन्हें वक्त पर निकल जाने दो।
लम्हा-लम्हा यूँ ही जीते चले जाओ
जो जुड़ते है उन्हें जोड़ते जाओ
कभी अंत होगा जो याद बनेगी
गुजरे पल कोई तो गुजर जाने दो
किसी को इतिहास बन जाने दो
वर्तमान को अतीत बन जाने दो
-प्रभात



लिखने लगा हूँ मैं

लिखने लगा हूँ मैं ..जो सहने लगा हूँ मैं
आदत सी हो गयी... अब जो कहने लगा हूँ मैं
कसमें है वादें है झूठे... खाने लगा हूँ मैं
होश में भी आके मैं... सब बताने लगा हूँ मैं
फ़िक्र नहीं है खुद की भी...तो गाने लगा हूँ मैं
बड़े बदनसीब बनकर आये है हम-2
जीने के लिए सारी... जिन्दगी भी है कम
चलते चलते सपनों में ....खोने लगा हूँ मैं
दुनिया वालों मेरी सुध भी ले लो-2
हंसने -गाने के सुख भी दे लो
जाने कहा से अब.....डरने लगा हूँ मैं
सहने लगा हूँ .....बस कहने लगा हूँ मैं



कह नहीं सकता

कुछ कहना था आज तुमसे, लेकिन आज कह नहीं सकता।
हां थोड़ा बहुत मज़ाक और कुछ अपना ज्ञान बांट नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ कह नहीं सकता।
कुछ बचे हुए सवाल नहीं कर सकता और अब जवाब
ढूंढ नहीं सकता।
जो वादे थे वो चाहकर पूरा कर नहीं सकता।
हां कुछ उलझनें तुम्हारी सुन सकता हूं मगर उन्हें मिटा नहीं सकता।
आज मैं तुमसे कुछ बाँट नहीं सकता।

#मजबूरियाँ# जीवन की सच्चाई#



तुम थे जमाना था

तुम थे जमाना था, जमाने में सब कुछ था
यकीं मानो कुछ नहीं, तो आईना भी खुश था
अब तो सिरदर्दियाँ इतनी है, धूप में भी बादल है
बादल की गरज और बिन मौसम बरसात है
जब भी तुम्हें सोचू, लगता है वहीं सब कुछ था
तुम थे.....

अक्सर जब तुम्हारी जुल्फें दिखती हैं
काली आंखों से तुम्हारी नजरें मिलती हैं
हल्की सी मुस्कुरा देती हो बेसुध हो जाता हूँ
ये सब कहीं और नहीं आईनें में होता है
आँखें अब भीग जाती हैं, पहले गम न था
तुम थे......
हर तरफ तुम्हारे इशारे पर लेता हूँ करवटें
तुम्हारे जाने पर भी तुम्हारा नाम है लबों पर
जितना मैं सोचता हूँ, बता दूं तो सच न लगेगा
दुनियां पागल समझती है, तुम्हें भी लगेगा
सुखाने को आंसू, तुम्हारा चेहरा काफी था
तुम थे......
प्रभात
#सचनामा
तस्वीर गूगल साभार
 23/09/2017


दर्शन पिछले दशक का

प्रिय फेसबुक, मेरे लिए तुम एक ऐसे डायरी के पन्ने की तरह हो जो पूरे दिन का हिसाब किताब सबके सामने रखते हो। बस दिक्कत ये है कि तुम्हें पीछे जाकर पलटने में बहुत दिक्कत होती है, फिर भी ऐसा लगता है कि तुम कुछ वर्षों बाद कोई न कोई मेमोरी मेरे सामने भेज ही दोगे।
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दर्शन पिछले दशक का
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छुट्टी का दिन है और होता भी क्या है इस दिन। हफ्ते भर की ऑफिस की थकान मिटा लूं । सोचते तो अक्सर हम सभी हैं। लेकिन आज क्या हर हफ्ते की कहानी ऐसी है कि थकान अगले दिन ही मिट पाती है। घर के राशन पानी लाने से लेकर पहनने तक के कपड़ों का बंदोबस्त अगले पूरे हफ्ते भर के लिए करना होता है। नींद खुलने के बाद अंगों का मशीनीकरण इस कदर हो जाता है कि कपड़े साफ करने और घर की सफाई करने के बाद कमर टूटने लगती है। कभी नहीं सोचा था कि ये जिम्मेदारियाँ शादी होने के पहले भी आ जाती हैं।

आज के दिन मेरी सुबह उस समय हुई जब सूरज बीचो-बीच आकर अस्त होने के लिए थोड़ा करवट बदल रहा था। रात में आफिस का काम करने के बाद मानो सब कुछ बदल गया है। सूर्योदय देखे अरसा बीत गया, और तो और कोयल की कूंक और कौवों का कांव सुने तो पूरे एक दशक हो गए। सब अच्छा लगता है। हां फिर भी सब अच्छा चल रहा है। दिल्ली है यहां तो जबसे कमरे के अंदर बल्ब की रोशनी मिलने लग गई तब से आज तक सूरज की रोशनी का अर्थ ही अप्रासंगिक हो गया। किसी प्रकार पिछली रात को सोने का मतलब मेरा यही होता है कि सुबह हो गई, यानी रात जो सोया करते थे आज कल सुबह नींद आती है और उसे हम अनायाश ही बोल देते है "रात"....मुझे लगता है कि अगली पीढियां हमारी कहांनियों में रात दिन का अंतर करना भूल जाएंगी।
सुबह सो कर उठने का टाइम वही करीब दोपहर के एक बजे रहा होगा। जल्दी से नित्यक्रिया का काम निपटाने के बाद अचानक ही बिना किसी योजना के अपने पास के नार्थ कैंपस जहां पर पूरा एक दशक गुजर गया, वहां जाने के लिए निकला। सबसे पहले मॉडल टाउन होते हुए पटेल चेस्ट की रेड लाइट पर किंग्सवे कैम्प होते हुए पहुंचा, तो एक दृश्य याद आया.....
"अरे प्रभात जल्दी आओ, हम 7 लोग फाइल बनाने आये है, कैफे हैं आ जाओ...यहीं बैठकर फाइल कंप्लीट करते है।" यह मित्र आज आजमगढ़ हैं और मुलाकात को कई वर्ष हो गए।
अंग्रेजी के गाने और एक कॉफी के साथ इतने जल्दी फाइल टेपते हुए पूरी हो जाती थीं कि आज याद करके लगता है कि वहीं पर फिर लौट जाऊं"
कैम्प से आगे पटेल चेस्ट के नाले के पास पहुँचकर नाले के दुर्गंध के बीच एक मयखाने के दृश्य की झलक देखने को मिलती है....
"सीढ़ियों पर चढ़चढ़ कर बुरा हाल हो गया और मीरा मेरा पिछले आधे घण्टे से इंतजार कर रही थी। मेरे पहुंचते ही मानो उसे सांस में सांस आया। वह खुश हो गई। मीरा के पास पहुंचकर सबसे पहले लगा कि वह कितने दिनों पहले से उसे जानता है। शाम को धीरे - धीरे जब मयखाने से महुए की खुशबू आने लगी तब उसने मीरा को भी उसमें मदहोश कर दिया। मैं तो हर बार की तरह मयखाने की मदहोशी से बच निकला लेकिन नए साल के पहले दिन मानो उसका असर मुझ पर भी इतना गहरा पड़ गया कि वह दिन आज भी याद कर मेरी सांसें ऊपर नीचे होने लगती हैं।"
क्रिश्चियन कॉलोनी के पास का एक दृश्य
"आज खुशी इतनी थी कि लगा कि जिंदगी का असली मतलब यही है। एकता का अर्थ तब समझ आया। एकाकी का अर्थ अब समझ आया। वे दिन जब उबर ओला के इंतजार ने हम सबको एक साथ कर दिए थे। उबर में बैठे मुझे ऐसा एहसास होने लगा था कि यह हमसफ़र यूँ ही बना रहेगा। गाड़ी की रफ्तार कम न हो। यह पल यूँ ही रुक जाए। यही सोच रहा था, लेकिन होना तो ये नहीं था। बिखराव भविष्य को मंजूर था...."
अब मैं अपनी स्कूटी को क्रिश्चियन कॉलोनी से आगे जंतु विज्ञान विभाग की ओर बढ़ाता हूँ..
काल करता हूँ, मित्र का फोन नहीं लग रहा था
सो लैब सीधे पहुँचता हूँ, एक सज्जन टकराते है......सर हेयर यू आर रिसर्च स्कॉलर...आई वांट यू टू डिस्कस अबाउट सीएसआईआर एग्जाम...यू आर जेआरएफ....व्हाई यू र नॉट ट्राइन्ग.... इवेन यू डिड योर एमएससी इन बॉटनी फ्रॉम डीयू.....आई केम हेयर टू प्रीपेयर नेट आफ्टर सिविल प्रीप्रेशन। सारे प्रश्नों के जवाब देने का मतलब अपना पूरा दिन खराब करना था। सिंपली आई एम डूइंग समथिंग एल्स....
खैर अब उनसे पीछा छुड़ा अपनी साथी से मिलकर किसी तरह जंतु विज्ञान विभाग से बाहर आता हूँ। खबर मिलती है कि आपके एक मित्र असोसिएट प्रोफेसर बन गए है...सोचा कि कॉल मिलाता हूँ मुलाकात हो जाये....खैर पता चला वो अभी बाहर है...फिर वनस्पति विज्ञान विभाग की ओर मुड़ता हूँ और पाता हूँ कि मैं अभी कितना अकेला हूँ। दो चार साथी जो मेरे कभी बहुत करीब हुआ करते थे आज वे बिल्कुल भी टच में नहीं है और फोन लगाने पर लगा भी नहीं। मुलाकात तो किसी से नहीं हो सकी.....केवल एक दृश्य पुनः आंखों के सामने आता है
"परीना और मैं दोनों एक दूसरे का हाथ पकड़े चले जा रहे हैं नहीं पता था कि ये हाथ यूँ ही कभी एक दूसरे से मिलेंगे पता तो कुछ भी और नहीं था लेकिन इस समय को आगे बढ़ाते हुए मुझे वह पल याद आया जब परीक्षा के बाद चाय पर शाम को कप सटाये सब एक दूसरे की ओर देख रहे थे"
अब वनस्पति विज्ञान विभाग की ओर से होते हए आर्ट्स फैकल्टी के गेट पर पहुंचा
एक दृश्य पुनः आंखों के सामने आया
"चलो आज हम सब रिपोर्टिंग कर लेते हैं, सीआरएल की ..तुम लिखो, और मैं पूछता हूँ ...प्रश्न....ज्ञान देने वाले भी लोग बहुत मिले थे"
हां वह पल भी था, जब एक दिन हंसराज होस्टल से करीब 12 बजे रात को मित्रों से परेशान होकर आंखों में आंसू लिए बक बक करता खुद से विवेकानंद की मूर्ति के पास बैठा आसमान को देख रहा था, इतना ही नहीं वह दिन भी याद है जब पिता जी जेल में थे और मुझे यह खबर सुनकर रोना आ रहा था....खूब रोया था उस दिन विवेकानंद की मूर्ति के पास बैठकर।
अब स्कूटी की रफ्तार तो कम हो गई थी....लेकिन इस भंवर से निकलकर लगा कि एक बार को माल रोड चल लिया जाए...सबसे पहले गवायर हाल जहां मैंने अपने 2 साल बड़े मस्ती से गुजारा था। वहां आकर नाई की दुकान के पास दाढी बनवाने पहुंचा...
अक्सर हर बार जब भी इधर आया तो इसी सैलून पर आया, मानो इस सैलून और नाईयों से काफी अच्छा दिल का रिश्ता है जो कभी छूटने देता ही नहीं।
रविवार के दिन तो अक्सर हर हफ्ते आकर इसी सैलून पर ए आई आर एफएम के गानों के साथ बाल कटाने बैठ जाता था
अब दिल किया, क्यों न वीकेआरवी के पराठे और चाय पर चल लिया जाए... आलू प्याज और पनीर के पराठे एयर गर्म चाय की चुस्कियों के बीच वह चारू के साथ का बीता वक्त ध्यान आ पड़ा
"चारू पता नहीं क्यों मुझे देखे जा रही थी और वह मुझे इस ओर इशारा कर रही थी कि तुमने जो बीते पलों को अपने साझा किया उन पलों के अतिरिक्त इस पल को भी समेट लो जिसके बाद हम और तुम इसके बाद शायद एक दूसरे के बेहद करीब हो जाएंगे।...हुआ भी यही हम वह शाम कैसे भूल जाएं जब नेट का एग्जाम देकर घंटों शाम को इसी कैंटीन में बैठ एक दूसरे की ओर मुस्कुरा रहे थे।"
अब साँझ ने तो मुझे इतना डुबो दिया कि मैं सोचने लगा कि यहाँ दुबारा किसी से मुलाकात न होगी बस यादों में ही ये मुलाकात कितना घुमाएगी।
इसके बाद मुखर्जी नगर की ओर मुड़ा एक किताब की खोज में घंटों बाद नेहरू विहार के नाले की ओर देखने लगा....वही नाला जिसके पास से आते जाते उन पन्नो को उल्टा करते थे जिनके लिए परीक्षा केंद्र कभी यूपी के इलाके तो कभी राजस्थान और एमपी टहलाया करते थे। वो दिन भी याद है जब मेरठ परीक्षा देने के लिए सुबह 4 बजे मुखर्जी नगर में बस में बैठा था और बस खराब हो गईं थी। मेरे मित्र परीक्षा के एक दिन पहले नींद की इतनी भयंकर गोली ले लिए थे कि उनसे उस दिन परीक्षा हॉल में पहुँचा ही न गया। दिन भर वो सोते रहे।
खैर इन यादों से मुलाकात हो गईं तो लगता है वो बीते दिन लौट आए ....लेकिन ये दिन जो लौटे हैं, वो कभी खुशियां देती हैं तो कभी उन्हीं के साथ खूब रुलाती हैं। बहुत मुश्किल है इन्हें भुला पाना। उससे भी ज्यादा मुश्किल है लोगों को भूल पाना। जो आज हर स्थानों पर अपनी पहचान छोड़ गए हैं। स्कूटी से चलना क्या पैदल चलना दूभर हो जाता है जब इन यादों के चक्कर मे पीछे हॉर्न बजाते रिक्शे, कार, ट्रक सब मुझसे परेशान हो जाते है और कभी कभार मुझे कुछ देर बाद समझ आता है कि मैं यादों से सड़कों पर गुजर रहा हूँ न कि किसी के साथ ।
-प्रभात
15/09/2017


Tuesday, 19 September 2017

हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते

 जरा मुझे भी सुनिए, हम नहीं कहते
हम असल में किसी से कुछ नहीं कहते
जिंदगी ने गम दिया तो भी सुकून है
हर कदम पर मजबूरियां है, नहीं कहते
बात हो रही है आपकी सरकार!! हम तो क्या हैं, इंसान.....न....शैतान........न.......तो फिर मेरे रिक्शे पर बैठी साहिबा की ......शब्द भइया...... न.....मैं असल में इज्जतदार कभी रहा ही नहीं। परिश्रम करते करते जिंदगी ने मुझे शाम के खाने के लिए गुटका दिया, वो भी लोकल.....भाड़े से देशी दारू कभी कभार.......और इस हड्डी को मजबूत करने के लिए .........लाल मिर्च वाला खाना, जो काले पानी में पकाया जाता है। ये तो रही खाने की बात और इज्जत की बात।
अब देखने और समझने की बात यह है.....
रात को रहने के लिए फुटपाथ की जगह (जिसे सफेद कुर्ते वाले अक्सर मेरे कर्म का नतीजा करार देते हैं) है....जहाँ से झनझनाते ट्रक की बयार, टायरों की रगड़ और उसमें पिसते आम लोगों की संवेदनाओं के बीच मेरी जिंदगी ।
हां मेरी जिंदगी......
जो असल में है तो दिखने में है तो बहुत बेकार
लेकिन अंदर से बहुत अच्छी भी है....
नींद आ जाती है बिना दवा लिए.....बिना पंखे के......बिना सोफे के .......बिना तकिये के....
बिना घर वाली के........बिना जिंदगी के।
अब पहनावे की बात भी सुन ही लीजिए...
नहीं नहाता ऐसा नहीं है, डेली नहाता हूँ, धूल से पसीने से और कभी कभार खून से ।
लेकिन शाम को अक्सर काली यमुना के किनारे बिन साबुन लिए 5 रुपये देकर शौचालय में जानी की आदत है.....कभी कभार पेनाल्टी के रूप में मेरी आधी कमाई वर्दी को चली जाती है.......गिड़गिड़ाहट में मेरे तन पर पड़े वो फटी कमीज का टुकड़ा भी फटकर रुमाल बन जाता है। दाढ़ी बढ़ जाती है तो पागल की तरह रोड पर चलते हुए मुझे एक रुपये की भीख किसी भक्त से मिल जाती है जो अक्सर चढ़ावे में हजार रुपये से कम मंदिरों में चढाना अपराध समझते है।
तो अब तो समझ गए होंगे मनुष्य के लिए 3 चीजें कौन सी जरूरत की चाहिए....खाना, रहना, पहनना
और ये तीनों ही से वंचित हम मनुष्य नहीं है.....इसलिए हम कुछ नहीं कहते केवल फुटपाथ पर रात को सोते हुए आसमां का एक चक्कर जरूर लगा लेते हैं..
फोटोग्राफी: प्रभात (कूड़े वाली)
फुटपाथ (गूगल)
-प्रभात