Saturday, 30 December 2017

मेरी डायरी के खुले पन्ने

प्रभात आपको जन्मदिन की शुभकामनाएं।

आपको पता है, आप 27 साल के हो चुके।  कैसी रीत है इस संसार की, कि यहां पर मानव अपने जन्मदिन पर खुशियां मनाता है इसलिए कि आज के दिन वह पैदा हुआ था। इसलिए कि आज उसकी उम्र एक साल घट गयी है। इसलिए क्योंकि आज के दिन के बहाने वह अपने उस पल को इस तरीके से जीना चाहता है कि शायद उसकी खुशियों में एक सहारा बन जाये कोई जो उस पल का गवाह बने जब केक कटे और प्यार से उस केक को खिला कर गले लगे। फिर बोले हैप्पी बथर्डे प्रभात।
क्या????
यही न कि जीवन के हर साल हम एक मित्र से मिलते हैं नए मित्र, नई सखी और नए लोग मिलते रहते हैं। हर समय कोई एक जाने वाले की जगह हाथ थाम लेता है। 

कुछ नहीं, आज के दिन यानी 28 दिसंबर 2016 को मैं चैन की नींद सो गया था। अगले दिन सुबह से लेकर शाम की महफ़िल ने बस इतना बता दिया था। कि जिंदगी न मिले दोबारा।

माँ के गर्फ़ से बाहर आकर बिल्कुल भी ऐसा नहीं लगा था कि जन्म और मरण की रीति भी चलती है। हां यह प्रक्रिया तब समझ आयी जब सुख दुख का एहसास हुआ। जब सोचना हुआ कि माँ और पिता का अर्थ क्या है जब पता चला कि जन्म की प्रक्रिया क्या है, जब पता चला कि शादियां क्या होती हैं, जब पता चला कि लड़का और लड़की में कुछ अंतर है। तब तक तो बिल्कुल नहीं जब मैं 10 वीं क्लास बोर्ड से पास नहीं कर लिया। क्योंकि मैं पांचवी क्लास तक फ्रॉक पहनने का जिद करता रहता था। 
12 वीं तक तो जनन की जानकारी भी अधूरी ही थी। रिप्रोडक्शन अध्याय तो समझ से बाहर था। जानकारियों का अभाव कहें या यूं कहें परदे में रहने की आदत थी।

29 दिसंबर 2017 का दिन आने वाला था और लगा कि जैसे कोई आहट दे रहा हो। कुछ चिंतन मनन करने के लिए। 25 तारीख से ही मन कर रहा था कि काश मैं अपने इस वर्ष को ठीक से समझ सकता। पुनर्विचार करता। क्या खोया क्या पाया समझ सकता। जिदंगी के इस पड़ाव पर ठहर सकता । इसलिए ही 28 और 29 दो दिनों की छुट्टी पर था। सोच रहा था कि मैं कहीं किसी ग्रह पर जाता जहां केवल मैं होऊँ। वहां कोई अग्नि की मशाल भी न हो। वहां किसी की आहट न हो। वहां चंद्रमा और तारे केवल अपने में मगन हों। वहां मानवीय स्मृतियां दखलअंदाजी न करें। वहां कोई इंसान भी न भटकता हो। वहां नदियां हों लेकिन शांत वे अपने में मगन हों। लेकिन ऐसी ख्वाहिश नहीं पूरी हो सकी। लेकिन, ऐसी ख्वाहिश जल्द ही पूरी करूँगा।

इसलिए क्योंकि मेरी ख्वाहिश पूरी नहीं हो सकी। क्योंकि ऐसी जगह शायद नहीं बनी कोई । है भी तो बाधाएं और पहुँच से दूर। है भी तो वहां जाने से पहले ही कई बंधन। घर परिवार से अभी बंधे हुए, सबसे बड़ी बात मित्र मंडली से विमुख नहीं है। लोग हमें खोज लेते हैं और हमें अकेले छोड़ना ही नहीं चाहते। इसलिए मैं वंचित रह गया इन चीजों से। 
लेकिन जब वंचित रह गया तो हुआ क्या क्या।। 29 के पहले चरण में यानी रात्रि 12 बजे से 5 बजे तक मित्र और गुरु दोनों कहलाने वाले परम आदरणीय जी और मेरे भाई का साथ मिला। कुछ समय बीच में बचा तो यूँ ही ख्वाहिश पूरी करने के लिए कई बार ध्यान मगन होने की कोशिश की, अंततः थोड़ी देर के लिए आंखे बंद की , फिर खोली और आईने को सामने रख कर आपने आपको देखने की कोशिश की। 
अंततः जो दिखा वही बता रहा हूँ।
मयखाने में जाने का फायदा तो होता है क्योंकि वह कम से कम कुछ उसी प्रकार के आनंद में मशगूल तो रह लेता है जैसा वह चाहता है। मैंने पता नहीं क्यों किस अवसाद से बचने की दवा ले रखी थी उसका असर कहें या यूँ ही कल्पना में खोने का डर, कि आंखों में जरा भी विचलन नहीं हुआ। बहुत कोशिश की लेकिन अश्रु धारा भी न बन सकी। मैं सकरात्मक ऊर्जा से भरपूर अपने आईने में खुद को निहारता जा रहा था। मिला क्या वही जो सच लगता है। 
दिल की आवाज में वही मासूमियत का चेहरा।
काश कोई समझ गया होता।
दिल की आवाज को पढ़ सके होता।
आंखों की नूर का अवलोकन कर पाता।
काश कोई
भावनाओं की प्रबल धारा और शून्य धारा में बहना सीख लिया  होता।
लेकिन नहीं, हमेशा कि तरह यही समझ सका कि मैं अंततः प्रभात हूँ सबकी तरह मगर यूनिक


अगले कुछ घंटों की नींद के बाद कुछ लोग मिले जिनका जन्मदिवस भी उसी दिन था। कुछ मित्र मंडली में नए चेहरे कुछ पुराने.... सभी मेरे पास के खाली कोने को पाटते रहे। इस तरह से और वही सभी की शुभकामनाएं दिल को छू गयीं। कोई दिल से तो कोई मन से तो कोई हाथ से लिखा तो कोई काल्पनिक लिपि में। हाँ कोई तो बिना कुछ कहे भी बहुत कुछ कह दिया।
29 तारीख रात 9 बजे घर पर फ़ोन किया....पहली बार पिताजी ने ना कहते हुए भी शुभकामनाएं दे ही दिया वैसे ही ...हर बार दिल से दिल की तरह ही शुभकामनायें बिना कहे ही पहुँचती थीं...खैर यह भी एक ऐसा समय था जो भावनाओं की धारा में मुझे बहा ले गया ठीक उसी प्रकार जैसे किसी अमीर को कोई गरीब जीवन दान दे देता हो ..
फिर फेसबुक और व्हाट्सएप पर मित्रों की शुभकामनाएं...जिसने जो भी लिखा वहीं काफी है, इस भागदौड़ भरी जिन्दगी में ..समय निकल कर 2 आखर भी लिखना.

किसी तरह मेरे जन्म का उत्सव खत्म होने की बारी आई। एक बार और धक्का लगा कि ....2017 और इसके पहले क्या क्या हुआ।
मगर अचानक घड़ी की सुई ने मुझे बिना बताएं 12 से 12.5 बजा दिया यानी कि 30 तारीख जिसमें , वही बची खुची ख्वाहिश पूरी करने की फिक्र ।
2018 आएगा बिना रुके और शायद मेरे लिए काफी अच्छा हो।

अगर कभी मेरी आत्मकथा लिखी गयी या फिर मेरे जीवन का इतिहास तो 2017 मेरे जीवन का अहम भाग होगा । इसके बिना मेरी जिंदगी अधूरी होगी।
-प्रभात 

Friday, 29 December 2017

कविमन

अनगिनत बार हो गए इस आस में परीक्षा देने जाते
शायद वो इस बार परीक्षा केंद्र पर ही मिल जाए...
-प्रभात का सुप्रभात

उसकी आहट में मैं भरे बाजार में खो गया।
पहली मुलाकात और अंतिम विदाई की यादों में।
इस तरह जैसे उसने दूर से ही छू लिया हो
मैं बेताब होने लगा, सांसे जैसे रुक गयीं हो
तेजी से भागा और उसके आगे रुका
जैसे ही उसने चेहरा घुमाया और फिर
मैं रुका ही नहीं, वह कोई और ही थी.....
https://static.xx.fbcdn.net/images/emoji.php/v9/fd0/1/16/1f602.png😂
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शुभकामनाओं की चाहत में कविमन लिए प्रभात-
आजकल शब्दों से लड़ रहा हूँ, शब्द मिल नहीं रहे कि मैं अपने मन के भाव को व्यक्त कर सकूं, पिछले 1 घंटे से लिख रहा हूँ, मिटा रहा हूँ और फिर लिख रहा हूँ, फिर समझ आया...कि न लिख पाऊंगा कभी....लेकिन जिद है कि इतना तो कह सकता हूँ न कि क्या हो रहा है ऐसा....
इक सागर प्यासा है
इक कहानी अधूरी है
दृश्य बने कुछ ऐसे लगा कि जैसे मेरे भीतर से कोई बहुत खास बहुत दूर चला गया हो, वह जितना पास था अब उतना ही दूर भी। जिंदगी कभी-कभी उसे मेरे पास ले आती है मगर देखता हूँ वह पास है मेरे, बहुत आसपास, घूम-घूम के मेरे अंतर्मन में भी, लेकिन वह अनायास ही परदा डाल कर एक कहानी को मार रही है।
मैं हर बार जब भी पास आती है तो सहम जाता हूँ, आँखे विपरीत हो जाती हैं, ढाँढस के बीज लिए आसपास कोई नहीं दिखता, और इतना सब कुछ देखते ही देखते......एकाएक जैसे मैं ही टूट कर बिखर जाता हूँ.....कुछ भाग जो मुझे सम्पूर्ण बनाता है वह अपूर्ण हो जाता है।....मीन बिन पानी तड़पने लगती है....
पानी की तलाश में फिर से शब्द के पास आने की कोशिश करता हूँ, लेकिन वह फिर कहती है कि आसमान को अभी देखो नहीं उस पर परदा लगा दो, क्योंकि अगर तुम देखोगे तो बरसने लगेगा बेमौसम ही।
उस पर पहरा बिठा दो जो तड़प रहा हो सब कुछ होने के बाद भी.....केवल धर्म संकट की वजह से।
खैर न समझिएगा, क्योंकि मैं खुद भी अब कह नहीं पा रहा हूँ कि शब्द क्यों नहीं पद्य के रूप में बंध रहे। सोचा वही लाइन लिख दूँ। मगर ये जिदवश लिख दिया बस...वैसा नहीं लिख सका जैसा चाहता था । प्रयास जारी तो है....जल्द ही लिखूंगा शायद....शुभकामनाएं दीजिये।
-प्रभात

प्रभात की ओर से सुप्रभात...

प्रभात की ओर से सुप्रभात...


मधुर व कुछ बढ़िया सा राग सुनाने रागिनी आ पहुँची। शीतल और मुस्कुराती हवा के साथ आकर गले लगाकर मानो उसने मुझमें असीम सकारात्मक ऊर्जा का संचार करा दिया।
अभी उसे आये कुछ ही पल बीते थे कि जोर-जोर से गरजते हुए बादल के साथ बारिश होने लगी। आसमानी गगन का पता नहीं पर अपने घर में सभी मगन दिख रहे थे। कबूतरों का पता नहीं पर घोसलों में बैठे अंडों से निकले नवजात बाहर आने को बेताब हो रहे थे। थोड़ा सा धुंध छटा तो देखा कि आश्चर्यजनक रूप से खड़ा पहाड़ सफेद बर्फ की चादर लपेटे मुझे देख रहा था और रागिनी उसे देखकर शरमा गई और मेरे पीछे मुँह छिपाने लगी। मैंने हँसमुख रागिनी को जैसे ही पकड़ा वह खिलखिला उठी। तभी सामने ध्यान गया तो रोमांचक दृश्य सामने था। सफेद बर्फ से ढकी चोटी के बीच सूरज सामने आने की कोशिश कर रहा था। लालिमा लेकर वह रागिनी को छूने की कोशिश कर रहा था। इससे रागिनी में उमंग आने के साथ-साथ उसके हाव-भाव भी बदल गए। थोड़ी देर में रागिनी के राग के साथ ही कोयल की कूक ने समां बांध दिया। अब बारिश न रही और न ही वह लालिमा। इन सबके बावजूद रागिनी और मैं, पहाड़, सूरज और कोयल सभी हैं मगर सब अपनी दुनियां में मस्त अलग-अलग।


Thursday, 7 December 2017

सफरनामा

साझा काव्य संग्रह के लिए मेरी रचनाएं "सफरनामा" पुस्तक में प्रकाशित हैं। आप सभी इसके साक्षी बने, इसके लिए आभार व्यक्त करता हूँ। 
यह मेरी चौथी साझा काव्य संग्रह की पुस्तक है।
25/09/17